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Baba banda singh bahadur: hindi me



  •  परिचय

बाबा बंदा सिंह बहादुर का जन्म अक्टूबर 1670 में एक राजपूत परिवार से हुआ था जो कश्मीर राज्य के जिला पंचायत के ग्राम राजौरी में किसान थे। जिनका बचपन का नाम लक्मण देव था|
Banda singh bahadur ke bare me

इनमे बचपन से एक कुशल योद्धा जैसी कलाएं थी, इन्हे घुड़सवारी और शिकार का बहुत शौक था तथा बचपन से ही इनमे महारथ हांसिल थी|
 प्रमुख तथ्य

बन्दा बहादुर एक प्रसिद्ध सिक्ख सैनिक और राजनीतिक नेता भी थे। वे भारत मे मुग़ल शासकों के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने वाले पहले सिक्ख सैन्य प्रमुख थेजिन्होंने सिक्खों के राज्य का विस्तार भी किया।इन्होने लोहागढ़ में खालसा पंथ की नीव रखी और मुगलो के खिलाफ आवाज बुलंद की| 
लक्मण देव 15 वर्ष की उम्र में एक वैरागी शिष्य बने और उनका नाम माधोदास हो गया कुछ समय तक पंचवटी (नासिक) में रहने के बाद दक्षिण की ओर चले गए और उसने आश्रम की स्थापना की | कुछ समय बहादुर बंदा सिंह आश्रम आने वाले साधवो का अपमान करने लग गए लेकिन जब 1708 में अपने आश्रम मे गुरु गोविन्द सिंह से मिले तो उनके विचारो में परिवर्तन आया तथा वह एक अनुशासन प्रिय सिपाही में बदल गए|
गुरु गोविन्द सिंह ने माधोदास को सिक्ख धर्म की दीक्षा दी और उनका नाम बन्दा सिंह बहादुर रख दिया | गुरु गोविन्द सिंह जी के सात और नौ वर्ष के बच्चो की जब सरहिंद के फौजदार वजीर खां ने क्रूरता से हत्या कर डाली तो बन्दा सिंह पर इसकी बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया हुयी | उन्होंने वजीर खान से बदला लेने की थान ली| उन्होंने पंजाब आकर बड़ी संख्या में सिक्खों को संघठित किया और सरहिंद पर कब्जा करके वजीर खा को मार डाला|  
इन्होने 1706 ई. में मुग़लों पर हमला करके बहुत बड़े क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर लिया। बन्दा सिंह बहादुर ने यमुना और सतलज के प्रदेशो को जीतकर लोहगढ़ का मजबूत किला बनवाया और सिक्ख राज्य की स्थापना की खालसा के नाम से शासन करते हुए उन्होंने सीखो के गुरुओ के नाम से सिक्के चलवाए | बाबा  का राज्य थोड़े दिन चला था की बहादुरशाह प्रथम (1707-12) ने आक्रमण करके लोहगढ़ पर कब्जा कर लिया उसकी मृत्यु तक बन्दा और उसके साथी अज्ञातवास में रहे | इसके उपरान्त बन्दा ने लोहगढ़ को फिर से अपने अधिकार में कर लिया और सरहिन्द के सूबे में लूटपाट आरम्भ कर दी। दक्कन क्षेत्र में उनके द्वारा लूटपाट और क़त्लेआम से मुग़लों को उन पर पूरी ताकत से हमला करना पड़ा।
बन्दा सिंह ने अपने राज्य के एक बड़े भाग को जित कर फिर से अपना अधिकार कर लिया और इसे उत्तर-पूर्व तथा पहाड़ी क्षेत्रों की ओर लाहौर और अमृतसर की सीमा तक विस्तृत किया। 1715 ई. के प्रारम्भ में बादशाह फ़र्रुख़सियर की शाही फ़ौज ने अब्दुल समद ख़ाँ के नेतृत्व में उन्हें गुरुदासपुर पर घेरा बंदी की गयी। खाद्य सामग्री के अभाव के कारण उन्होंने 7 दिसम्बर को उन्होंने  आत्मसमर्पण कर दिया। फ़रवरी 1716 को 794 सिक्खों के साथ वह दिल्ली लाये गए जहाँ 5 मार्च से 12 मार्च तक सात दिनों में 100 की संख्या में सिक्खों की बलि दे दी गयी। 16 जून को बादशाह फ़ार्रुख़शियार के आदेश से बन्दा सिंह तथा उनके मुख्य सैन्य-अधिकारियों के शरीर काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये।
सरहिंदी पर चढाई-
मई 1710  ईस्वी में सरहिंद का मशहूर युद्ध छप्पर चिरी क्षेत्र में लड़ा गया। इस युद्ध में बाज सिंह जी बंदा बहादुर जी की सेना में दाहिने भाग के प्रमुख थे। सरदार बाज सिंह जी ने नवाब पर हमला कर के बंदी बना लिया|
नवाब जिसने गुरु गोविन्द सिंह के परिवार तथा उनके क़रीबीओ उनके चारो बेटो को मरवा दिया था।सरहिंद की सुबेदारी सिख राजपूत बाज सिंह पवार को दे दी गयीयुद्ध जीतने के बादसरदार बाज सिंह परमार ने सरहिंद पर साल तक राज किया।
बन्दा बहादुर ने सतलुज नदी के दक्षिण में सिक्ख राज्य की स्थापना की। उन्होंने खालसा के नाम से शासन भी किया और गुरुओं के नाम के सिक्के चलवाये। बंदा सिंह ने पंजाब हरियाणा के एक बड़े भाग पर अधिकार कर लिया और इसे उत्तर-पूर्व तथा पहाड़ी क्षेत्रों की ओर लाहौर और अमृतसर की सीमा तक विस्तृत किया| इन्होने हरयाणा के जाटो को मुस्लिम राजपूतो के आंतक से निजात दलाई थी|
इनके सम्मान मे दिल्ली के मशहूर बारापुला एलिवेटिड रोड का नाम बदलकर अब बंदा बहादुर के नाम पर रखा दिया गया है तथा बारापुला फ्लाईओवर का नाम भी 'बाबा बंदा बहादुर सेतु' हो गया है जहाँ उनका अंतिम संस्कार हुआ|
        दोस्तों में आशा करता हु की आपको सिख सैनिक बाबा बन्दा बहदुर सिंह के बारे में जानकर और पढ़ कर बहुत गर्वे हुआ हे, कृपया निचे कमेंट कर के अपने कीमती सुझाव जरूर के और हमें बताये की आपको ये आर्टिकल केसा लगा| 

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