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महाराणा कुम्भा जिन्होंने अपने शासन काल मे एक भी युद्ध नहीं हारा

मेवाड़ के इतिहास में महाराणा कुम्भा का नाम देश के उन चंद राजाओ में से इक हे जिनके नेतृत्वे में मेवाड़ ने एक भी युद्ध नहीं हारा था| 


Maharan kumbha ki jivni
Maharana Kumbha



  •  इन्ही के जीवन काल में मेवाड़ का सर्वाधिक सांस्कृतिक विकास हुआ था और इन्ही के काल में सर्वधिक इमारतों का निर्माण भी हुआ तथा इन्ही के जीवन कल में मेवाड़ ने सर्विधक प्रसिद्धगी पायी थी|कुम्भा ने मुसलमानों को अपने-अपने स्थानों पर हराकर राजपूती इतिहास को एक नया रूप दिया। इतिहास में ये 'राणा कुंभा' के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं। महाराणा कुुुम्भा को चित्तौरगढ़ दुर्ग का आधुुुनिक निर्माता भी कहते हैं क्योंकि इन्होंने चित्तौड़ दुर्ग के अधिकांश वर्तमान भाग का निर्माण कार्य कराया |

  •  महाराणा कुम्भा का जन्म महाराणा मोकल के यहाँ हुआ था| राणा मोकल की मृत्यु के बाद कुम्भा सत्र 1433 में मेवाड़ की गद्दी पर बैठे थे जिन्होंने 1968 तक राज किया था| 

  •  महाराणा मोकल की हत्या चाचा,मेरा और महपा पंवार ने की थी इसलिए कुम्भा ने राजा बनते ही सबसे पहले अपने पिता का बदला लेने की ठानी अतः उन्होंने अपने मामा रायमल तथा भाई राणा लाख की मदद से चाचा, मेरा का दमन किया। जिनमे महपा पंवार बच कर भागने में कामयाब हुआ और मांडू के सुल्तान के यहाँ सरण की कुम्भा ने सुल्तान को महपा का समर्पण करने की मांग की जिसको सुल्तान ने टाल दिया, परिणाम सवरूप दोनो के बिच युद्ध होना ही था| 

  •  महाराणा कुम्भा ने 1437 को मांडू पर सारंगपुर नामक स्थान पर आक्रमण की जहा पर मांडू का सुल्तान बुरी तरहे हार गया उसे बंदी बना लिया गया और कैदखाने में डाल दिया गया बाद में माफ कर छोड़ दिया गया| इसी जित के उपलक्ष में महाराणा कुम्भा ने 1438  चित्तौरगढ़ के किले में विजय स्तम्भ का निर्माण शुरू करवाया| 


  •  विजयस्तम्भ -
       यह एक साथ मंजिला ईमारत हे जिसके ऊँची 130 फिट है,जिसमे            150 सीढिया लगी हे|        इसकी सातवीं मंजिल पर भगवन विष्णु की मूर्ति रखी गयी हे, जो              एक बार बिजली गिरने से खिंडित हो गयी थी|        इसकी तीसरी मंजिल पर 9 बार अल्लाह का नाम लिखा गया है| 
Vijaysthambh mevar
Vijaysthambh



        यही राजस्थान पुलिस का प्रतीक चिन्ह भी हे|        विजयस्तम्भ आज भी शान से खडा कुम्भा की कीर्ति का बखान कर             रहा है| 


  • मालवा के सुल्तान ने समय समय पर 5 बार मेवाड़ पर आक्रमण किया लेकिन उसे हर बार राणा की कूटनीति और शौर्य के आगे घुटने टेकने पड़े| फिर 1456  मालवा और गुजरात के सुल्तान के बिच एक समजोता हुआ जिसके अनुसार वो दोनों मिलकर मेवाड़ पर आक्रमण करेंगे और मेवाड़ दो बराबर हिस्सों में बाँट लेंगे लेकिन इस संधि के फलसवरूप दोनों सुल्तानों ने मेवाड़ पर आक्रमण की इस बार भी दोनों को हर का मुहे देखना पड़ा|

  • महाराणा कुम्भा ने अपने जीवन काल में 84 किलो का निर्माण करवाया| जिनमे मुख्य किले कुम्भलगढ़ का किला जिसे राणा ने अपनी पत्नी रानी कुम्भल के नाम पर करवाया जो की राजसमंद में स्थित हे इस दुर्ग की दीवार को भारत की महान दीवार भी कहा जाता जिस पर एक साथ दो घुड़सवार एक साथ चल सकते है और यह दीवार 32 किलोमीटर में फैली हे| इसके अलावा उन्होंने चित्तौरगढ़ किले का पुनेउद्धार भी करवाया साथ ही सिरोही का बसंती दुर्ग, मचान दुर्ग आदि का निर्माण कार्य करवाया|इन्होने कुम्भलगढ़ में कुम्भल देव मंदिर का निर्माण भी करवाया| 

  • कुम्भा अनेक पुस्तके लिखी इस लिए इन्हे कवी राज भी कहा जाता है| जिनमे प्रमुख हे संगीतराज,चंडीसतक और गोविन्द राज जिनमे रसिकप्रिया पर टिका भी शामिल हे|

  • वे नाट्यशास्त्र के ज्ञाता और वीणावादन में भी कुशल थे। कीर्तिस्तंभों की रचना पर उन्होंने स्वयं एक ग्रंथ लिखा और अपने शिल्पी मंडन आदि सूत्रधारों से शिल्पशास्त्र के ग्रंथ लिखवाए। इस महान राणा की मृत्यु अपने ही पुत्र उदयसिंह के हाथों 1469  हुई।इसके बाद उनके जेयष्ठ पुत्र राणा अमर सिंह ने मेवाड़ की गद्दी संभाली| 


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